चयनित डॉक्टरों ने लगाया मनमानी का आरोप—उच्च रैंक वालों को दूरस्थ जिलों में भेजा, ‘सहमति’ देने वालों को मिला मनचाहा संस्थान; स्वतंत्र जांच की मांग तेज
प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की लंबे समय से जारी कमी को दूर करने के लिए लोक सेवा आयोग (MPPSC) ने वर्ष 2024 में विज्ञापन क्रमांक 04/2024 के तहत सर्जरी, पीडियाट्रिक और एनेस्थीसिया विषयों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की सीधी भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद वर्ष 2025 में इंटरव्यू आयोजित किए गए और चयन सूची लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को सौंप दी गई। विभाग ने इन पदों पर नियुक्ति हेतु ऑनलाइन काउंसलिंग कराना तय किया, जिसके लिए तकनीकी सहयोग एनएचएम के अधीन कार्यरत नेटलिंक कंपनी को सौंपा गया।
यही वह बिंदु रहा जहां से संपूर्ण प्रक्रिया संदिग्ध होती गई।
दो महीने तक रोके रखे गए परिणाम, ‘सहमति’ के नाम पर मनचाही पोस्टिंग का आरोप
सूत्रों के अनुसार, ऑनलाइन काउंसलिंग पूरी होने के बावजूद लगभग दो महीने तक परिणाम रोके गए। इस दौरान कई चयनित डॉक्टरों को विभागीय स्तर से फोन कर ‘सहमति’ ली गई, और जिन्हें अनुकूल जवाब देते पाया गया, उन्हें पसंदीदा जिला या संस्थान आवंटित कर दिया गया।
दूसरी ओर, उच्च रैंक होने के बावजूद कई योग्य अभ्यर्थियों को दूरस्थ या कमज़ोर संस्थानों में भेज दिया गया।
गुना के एक नव-चयनित सर्जन ने बताया कि उनकी रैंक 9 होती हुई भी उन्हें ऐसी संस्था में भेजा गया जो छोटी और सीमित संसाधनों वाली है, जबकि रैंक 16 वाले उम्मीदवार को जिला चिकित्सालय मिल गया—वही विकल्प जो उसने चॉइस में भरा था।
इसी तरह, एक आदिवासी जिले के एनेस्थीसिया विशेषज्ञ ने बताया कि काउंसलिंग के दौरान इंदौर जिला एनेस्थीसिया के लिए खुला ही नहीं था, लेकिन बाद में इंदौर के एक डॉक्टर को सीधे नियुक्ति-पत्र जारी कर दिया गया। आरोप है कि संबंधित डॉक्टर विभाग की स्थापना शाखा के एक अधिकारी का बैचमेट है, इसलिए उसे “विशेष लाभ” दिया गया।
यह भी दावा किया जा रहा है कि 30 से अधिक चिकित्सकों ने चॉइस भरी ही नहीं, और आंतरिक सांठगांठ के जरिए उन्हें पसंदीदा स्थान दे दिए गए।
मुख्यमंत्री ने बांटे नियुक्ति-पत्र, पर धांधली छुपा ली गई
7 नवंबर 2025 को भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा विशेषज्ञ चिकित्सकों को सम्मानपूर्वक नियुक्ति-पत्र वितरित किए गए। कुल 334 पदों में
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75 एनेस्थीसिया विशेषज्ञ
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62 सर्जरी विशेषज्ञ
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106 पेडियाट्रिक विशेषज्ञ
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91 नर्सिंग अधिकारी शामिल थे।
लेकिन चयनित डॉक्टरों का आरोप है कि जिस “पारदर्शी” प्रक्रिया का दावा किया गया था, वह केवल कागज़ों तक सीमित थी। समारोह के बाद कई डॉक्टरों को पता चला कि काउंसलिंग से निकली मूल सूची को बदलकर मनमाने आवंटन कर दिए गए।
“मेहनत और मेरिट का कोई मूल्य नहीं”—डॉक्टरों की गहरी निराशा
कई डॉक्टर इस धांधली से इतने आहत हैं कि वे नौकरी छोड़ने पर विचार कर रहे हैं।
एक चयनित चिकित्सक ने कहा—
“अगर मेरिट और पारदर्शिता का कोई मूल्य नहीं है, तो इस सिस्टम में रहकर क्या फायदा?”
ऐसे समय में जब प्रदेश पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी का सामना कर रहा है, इस तरह की अनियमितताएँ न केवल डॉक्टरों का मनोबल गिराती हैं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को भी कमजोर कर देती हैं।
गड़बड़ी कहाँ हुई—आईटी सिस्टम में, कंपनी में या विभाग की स्थापना शाखा में?
अब बड़ा सवाल यह है कि इस गड़बड़ी का जिम्मेदार कौन है?
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एनएचएम की आईटी टीम?
जिनके पास संपूर्ण चॉइस-फिलिंग और काउंसलिंग डेटा सुरक्षित था। -
प्राइवेट कंपनी?
जिसने प्लेटफ़ॉर्म और सॉफ़्टवेयर विकसित किया और जिसके पास परिणाम तैयार करने की तकनीकी जिम्मेदारी थी। -
या विभाग की स्थापना शाखा?
जहाँ अंतिम आवंटन सूची गई और जहाँ से मनमानी के आरोप सबसे ज्यादा लग रहे हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि काउंसलिंग से निकला वास्तविक डेटा बदला गया और वही बदला हुआ डेटा नियुक्ति-पत्रों में दिखाया गया।
क्या सरकार सच्चाई सामने लाएगी या फाइलें दबा दी जाएँगी?
यह पूरा मामला न केवल विभागीय पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, बल्कि सरकार की उस मंशा पर भी संदेह खड़ा करता है जो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की बात करती है।
चयनित डॉक्टरों ने इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच की मांग की है, ताकि दोषियों की पहचान हो और भविष्य में किसी भी चिकित्सक को ऐसे अपमानजनक अनुभव से न गुजरना पड़े।
राज्य को भारी नुकसान—जनता की जान से जुड़ा सवाल
डॉक्टरों की हताशा का नुकसान केवल उन्हें नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश को उठाना पड़ेगा।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की पहले से चल रही कमी और गहरी हो जाएगी, और इसका सीधा असर जनता की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा।
अगर भर्ती प्रक्रिया ही भरोसेमंद न रहे, तो स्वास्थ्य-तंत्र को मजबूत करने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

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