MP की NEET काउंसिलिंग में लगातार विवाद: सीट आवंटन से लेकर प्रमाण-पत्रों तक कई आरोप
भोपाल। मध्यप्रदेश की NEET UG काउंसिलिंग प्रक्रिया पिछले दो वर्षों से लगातार विवादों में घिरी हुई है। काउंसिलिंग के दौरान सामने आई अनियमितताओं, फर्जी प्रमाण-पत्रों के आरोपों और संदिग्ध सीट आवंटन ने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मामला अब इतना गंभीर हो गया है कि यह सीधे विधानसभा में उठ चुका है, जहाँ सरकार से कड़े सवाल पूछे गए।सबसे बड़ा विवाद उस नियुक्ति को लेकर है जिसमें राज्य-स्तरीय NEET काउंसिलिंग जैसा अत्यंत तकनीकी और संवेदनशील कार्य, लगातार दूसरे वर्ष भी एक नियत वेतन वाले अस्पताल प्रबंधक को सौंपा गया है। आरोपों के अनुसार:
वह चिकित्सा शिक्षा कैडर का अधिकारी नहीं है
उसके पास काउंसिलिंग का कोई अनुभव नहीं
न तकनीकी विशेषज्ञता
न ही ऐसे निर्णयात्मक कार्यों का वैधानिक अधिकार
इसके बावजूद वही दस्तावेज़ सत्यापन, NOC, अभ्यर्थियों के रिकॉर्ड संभालने और सीट आवंटन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में केंद्रीय भूमिका निभाता रहा।
लगातार दो वर्षों में समान गड़बड़ियाँ – ‘त्रुटि’ नहीं, ‘सिस्टमेटिक पैटर्न’?
कई अभिभावकों और छात्रों ने यह शिकायत दर्ज कराई है कि:
NRI सीटों में अनियमित आवंटन
फर्जी प्रमाण-पत्रों का उपयोग
Stray/Mop-up round में गैर-मेधावी छात्रों को सीटें मिलना
सीट ब्लॉकिंग और देरी से सीट जारी होना
दस्तावेज़ सत्यापन में अनावश्यक दखल
इन घटनाओं के कारण प्रभावित अभ्यर्थियों में भारी असंतोष है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार दो वर्षों तक एक जैसी अनियमितताएँ सामने आना यह दर्शाता है कि यह महज गलती नहीं, बल्कि किसी संगठित और संरक्षित तंत्र की ओर इशारा करता है।
सबसे बड़ा सवाल — FIR क्यों नहीं?
कई मंचों पर शिकायतें दर्ज होने के बावजूद:
एक भी FIR दर्ज नहीं हुई
न कोई पुलिस जाँच शुरू हुई
न कोई विभागीय जिम्मेदारी तय की गई
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बिना FIR के इतने बड़े पैमाने पर फैले आरोपों की गहराई तक जाँच संभव ही नहीं है। यही कारण है कि आरोपों की गंभीरता और बढ़ जाती है। विधानसभा में मामला उठने के बाद बढ़ी हलचल विधानसभा में पूछे गए सवाल में सीधे यह मुद्दा उठाया गया कि
> “एक नियत वेतन वाले अस्पताल प्रबंधक को राज्य-स्तरीय काउंसिलिंग जैसा संवेदनशील कार्य किस आधार पर सौंपा गया?”
यह प्रश्न न केवल इस नियुक्ति पर, बल्कि पूरे चयन व काउंसिलिंग मैनेजमेंट सिस्टम पर उंगली उठाता है।
किसका हो रहा है सबसे बड़ा नुकसान?
इस विवाद का सीधा असर पड़ रहा है: मेधावी छात्रों पर, जो कठिन मेहनत के बावजूद सीटें गंवा रहे हैं
SC/ST/OBC/EWS वर्गों पर, जिनकी आरक्षित सीटों में फर्जी दस्तावेज़ों की घुसपैठ की आशंका
मूल निवासी अभ्यर्थियों पर, जिनके अधिकार प्रभावित हो रहे हैं
सिस्टम की विश्वसनीयता पर, जिस पर जनता का भरोसा कमजोर हो रहा है
काउंसिलिंग की त्रुटियाँ कई बार अभ्यर्थियों को अत्यधिक मानसिक दबाव में डाल देती हैं, जिसका परिणाम गंभीर हो सकता है। जांच और जवाबदेही की मांग तेज अभिभावक, छात्र, तथा विशेषज्ञों द्वारा निम्न मांगें रखी जा रही हैं— राज्य-स्तर पर काउंसिलिंग का संचालन कर रहे व्यक्ति को तत्काल हटाया जाए SIT / लोकायुक्त / STF द्वारा उच्च स्तरीय जांच
पिछले दो वर्षों की पूरी प्रक्रिया की फोरेंसिक ऑडिट मोबाइल, कॉल रिकॉर्ड और WhatsApp डेटा की साइबर-फोरेंसिक जांच
संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए

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