मध्यप्रदेश में भारतीय जनता युवा मोर्चा की कमान को लेकर राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचल लगातार तेज होती जा रही है। सवाल यह है कि आगामी संगठनात्मक नियुक्ति में असल वजन किसका चलेगा—मुख्यमंत्री का प्रभाव, संगठन का विस्तृत अनुभव या फिर प्रदेश राजनीति में प्रचलित गुटबाज़ी और पट्ठा-वाद की परंपरा। वर्तमान में युवा मोर्चा की अध्यक्षता वैभव पवार के पास है, जिन्हें 2021 में नियुक्त किया गया था। उन्होंने अपने कार्यकाल में सदस्यता अभियान, युवाओं को जोड़ने की पहल और जिला-मंडल स्तर पर कई कार्यक्रमों के माध्यम से संगठन को सक्रिय बनाए रखने की कोशिश की है। इसके बावजूद, यह चर्चा हमेशा बनी रहती है कि युवा मोर्चा के शीर्ष पदों का चयन अधिकांशतः दिल्ली और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के संकेतों पर निर्भर करता है, जिससे यह धारणा भी जन्म लेती है कि राज्य इकाई की भूमिका उतनी निर्णायक नहीं होती।

संगठन के भीतर एक धड़ा यह मानता है कि मजबूती, अनुशासन और निरंतरता के लिए अनुभवी और जमीनी संगठनकर्ता को कमान मिलनी चाहिए, ताकि युवाओं के बीच प्रभाव और दायरा बढ़े। वहीं, दूसरा पक्ष यह तर्क भी देता है कि राजनीतिक प्रभाव रखने वाले युवा चेहरों, खासकर मुख्यमंत्री या शीर्ष नेताओं के नजदीकी व्यक्तियों को ऐसे पदों पर रखा जाना स्वाभाविक है, क्योंकि इससे सरकार–संगठन के बीच तालमेल आसान होता है। इसके साथ ही, कई बार स्थानीय गुट, प्रभावशाली नेता और आंतरिक खींचतान भी नेतृत्व चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे "पट्ठा-वाद" की चर्चा और तेज हो जाती है।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में युवा मोर्चा किस दिशा में आगे बढ़ता है। क्या नेतृत्व का चयन संगठन को और अधिक सक्रिय, गतिशील और युवाओं से सीधे जुड़ा हुआ बनाएगा, या फिर यह पद केवल औपचारिकता तक सीमित हो जाएगा? युवा मोर्चा भाजपा के भविष्य के नेताओं की पाठशाला माना जाता है, ऐसे में यह नियुक्ति न केवल संगठन की रणनीति बल्कि आने वाली पीढ़ी की राजनीतिक दिशा भी तय कर सकती है।